सेब
बचपन में हमारे यहाँ सेब के बाग होते थे. बड़े-बड़े लाल-लाल सेब पेड़ों से झूला करते थे. आमदनी भी ठीक-ठाक हो जाती थी. खैर अब तो हमारे और गाँव के बाकी बाग-बगीचे गायब हो चुके है. वहां पर मॉल, प्राइवेट स्कूल, हॉस्पिटल, फ्लैट और ना जाने क्या-क्या बन गया है. और आस-पास की दुकानों में फुटफॉल भी बड़ा तगड़ा है. दुनिआ के मानक के हिसाब से काफी 'विकास' हो चूका है. लोग बर्गर, कॉफ़ी उड़ा रहे हैं; नए फैशन के कपड़े पहन रहे हैं; चमचमाती गाड़ियों में सरर् से सड़कों पर दौड़ रहे हैं.
बचपन में जब पेड़ों पर फल आने लगते तो तोतों का कहर भी साथ लाते थे. मेरा पूरा परिवार पंछियों से सेबों को बचाने में लगा रहता. लम्बी-लम्बी लग्गियों से तोतों को भागते लेकिन तोते भी गजब बेशरम, जितना भगाओ उतनी बार वापस, आधे फल खाते थे, आधे गिराते थे जो मंडी में आधे दामों में बिकते. मैं अधखाए फलों को देखता था तो तोतों पर गुस्सा आती थी. अरे! एक सेब पूरा खा जाते, उसके एवज में पांच ख़राब करने की क्या ज़रूरत थी. खैर ये तो हर साल का सिलसिला था. सारे फल टूटने के बाद तोते भी कहीं गायब हो जाया करते थे.
बगीचे के बीचों-बीच एक पेड़ ऐसा था जिसके सेब सबसे रसीले होते थे. बाकी पेड़ों से घना और सेबों से लदा हुआ वो कुछ ज़्यादा ही सुर्ख लाल दिखता था. और मज़े की बात ये की उसपर कोई तोते भी नहीं टूटा करते थे. मुझे काफी अचम्भा होता की सबसे घना और रसीला होने के बावजूद ये तोतों की नज़र में क्यों नहीं आता. कई सालों बाद एक दिन पिताजी ने बताया की बहुत साल पहले उसी पेड़ से लटक कर एक किसान ने आत्महत्या कर ली थी. शायद उसी का भूत उस पेड़ की रक्षा करता हैं. सुनने में अजीब लगा पर क्या करते, बचपन में सबके पिताजी सही ही लगते हैं.
एक दिन दोपहर में मैं और मेरा बड़ा भाई चिड़ियों को भगाने में लगे थे. हम उन्हें एक पेड़ से भगाते, वो दूसरे पर जाकर बैठ जाती. उस दिन रोज़ से ज़्यादा ही मशक्कत करनी पड़ी. घर से जब खाने के लिए बुलावा आया तो भाई ने खीझते हुए लग्गी फेंकी और बोला, "क्या ही अच्छा होता अगर हर पेड़ से लटक कर कोई किसान मर जाता. कम से कम आमदनी तो अच्छी होती."
आज मॉल में नई पिक्चर लगी हैं और मैं अपने परिवार के साथ देखने आया हूँ. लोगों का झुण्ड मल्टीप्लेक्स में घुसने को तैयार खड़ा है. 'विकास' देखते ही बनता है और आमदनी भी तगड़ी हो रही है. अनायास ही मन सोचने लगा की ना जाने कितने किसान किन-किन पेड़ों से लटके होंगे इस आमदनी के चक्कर में.
Well said.. Writer saheb
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